मालवा के युग पुरूष और मालवी भाषा/ बोली के जनक दादा बालकवि बैरागी जी इस तरह विदा हो जायेगे लगता ही नहीं | इस उम्र में भी मंच पर कविता पढना और सफर कर अक्सर इंदौर आना उन जैसे गहन गंभीर व्यक्ति के लिए ही सम्भव था |दादा बैरागी मंचो के कवि तो थे ही साथ ही एक कुशल राजनितिज्ञ और कुशल वक्ता भी थे उन्होंने लोकसभा ,राज्यसभा और विधान सभा तीनो में अपनी नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया | मालवी कविताओ में उनका श्रृंगार,वीर और करुण रस में गीतों से लोगो को मोहित सा कर लिया था | उनकी “पणहारी “ सुनने के लिए लोग पूरी रात बेठे रहते थे | उनका “आई जावो मैदान में” ओज गीत और “चटक म्हारा चंपा “ भी काफी पसंद किया गया | “देश म्हारो बदल्यो रे देश म्हारो बदल्यो “ गीत को काफी सुना गया | “उतारू थारा वारण ए म्ह्रारा कामनगारा की याद” सोंदर्य का वर्णन आज भी लोगो को याद हे |लता मंगेशकर ने उनका गीत "तू चंदा में चांदनी तू तरवार की शाख रे" गाया जो काफी मशहूर हुवा और आज भी लोगो की जबान पर हे |उनकी कविता की अंतिम लाइने सभी याद कर रहे हे की "चाहे सारे सुमन बिक जाए ,अपनी गंध नही...
मालवा के युग पुरुष श्री बालकवि बैरागी